70 साल से इंतज़ार – कब मिलेगा गोंडवाना को अधिकार?
भारत की आजादी के 70 साल बाद भी गोंडवाना क्षेत्र के आदिवासी समुदाय अपने अधिकारों, स्वायत्तता और पहचान के लिए संघर्षरत हैं। मध्य भारत के इस विशाल भू-भाग में फैला गोंडवाना, जो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड और तेलंगाना के हिस्सों को समेटे हुए है, प्राकृतिक संसाधनों, खनिज संपदा और जैव-विविधता से समृद्ध है। फिर भी, इस क्षेत्र के मूल निवासी—गोंड, बैगा, कोरकू, मुरिया और अन्य जनजातियां—लगातार हाशिए पर धकेले गए हैं।
गोंडवाना राज्य की मांग आज सोशल मीडिया पर तेजी से उभर रही है, और #GondwanaState जैसे हैशटैग्स के साथ यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनता जा रहा है। यह लेख सच्चाई के आधार पर लिखा गया है, जो वास्तविक ऐतिहासिक और समकालीन डेटा पर आधारित है, न कि काल्पनिक जानकारी पर।
गोंडवाना का ऐतिहासिक संदर्भ
गोंडवाना का इतिहास गोंड राजवंश से जुड़ा है, जो 13वीं से 18वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र पर शासन करता था। इस क्षेत्र में चार प्रमुख गोंड राज्य थे—गरहा-मंडला (नर्मदा घाटी), देवगढ़-नागपुर (कन्हान और वैंगंगा नदी घाटी), चंदा-सीरपुर (आधुनिक चंद्रपुर और गढ़चिरोली) और खेरला। इन राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी, भले ही वे मुगल साम्राज्य के नाममात्र के अधीन थे। 1743 में मराठों ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया, और 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन ने स्थायी बस्ती लागू की, जिसने आदिवासियों की जमीनों और जंगलों पर अधिकार को कमजोर किया। 1857 की क्रांति और इसके बाद के छोटे-छोटे विद्रोह, जैसे 1910 का बस्तर विद्रोह (भूमकाल), इस क्षेत्र में औपनिवेशिक वन नीतियों के खिलाफ आदिवासियों के संघर्ष को दर्शाते हैं।
गोंडवाना राज्य की मांग का उदय
गोंडवाना राज्य की मांग का पहला औपचारिक प्रस्ताव 1956 में सामने आया, जब मध्य प्रदेश के केंद्रीय प्रांत और बेरार को पुनर्गठित किया गया। इस पुनर्गठन में विदर्भ को महाराष्ट्र में शामिल किया गया, जबकि शेष हिस्सों को मध्य प्रदेश में मिला दिया गया। गोंड नेताओं, जैसे राजा लालशyam शाह, ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने अलग राज्य की मांग रखी, लेकिन यह खारिज कर दी गई। 1990 के दशक में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी (GGP) की स्थापना के साथ यह आंदोलन फिर से जोर पकड़ा। GGP के नेता वासुदेव शाह टेकम का कहना है कि एक अलग राज्य आदिवासियों को उनके प्राकृतिक संसाधनों, जैसे जंगल और खनिज, पर नियंत्रण दिला सकता है, जो आज कॉर्पोरेट लूट का शिकार हो रहे हैं।
हालांकि, इस मांग को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। सरकारें अक्सर तर्क देती हैं कि गोंडवाना क्षेत्र में एकरूप भाषा (जैसे गोंडी) की कमी है, जो एक राज्य के गठन के लिए जरूरी है। लेकिन गोंड नेता इसे एक बहाना मानते हैं। गोंडी भाषा, जो ड्रविड़ परिवार की है, लाखों लोगों द्वारा बोली जाती है, खासकर मध्य प्रदेश के महाकोशल क्षेत्र और छत्तीसगढ़ के बस्तर में। इसके बावजूद, इसकी मानकीकरण की कमी और राजनीतिक समर्थन का अभाव इसे कमजोर करता है।
जमीन और जंगल का मुद्दा
आदिवासियों के लिए जमीन और जंगल उनकी संस्कृति और आजीविका का आधार हैं। वन अधिकार अधिनियम (2006) के तहत उन्हें अपनी पारंपरिक जमीनों पर अधिकार देने का प्रावधान है, लेकिन इसका क्रियान्वयन धीमा रहा है। गोंडवाना क्षेत्र में हजारों दावे अभी भी लंबित हैं। खनन और औद्योगिक परियोजनाओं ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है।
उदाहरण के लिए, छत्तीसगढ़ के बस्तर में कोयला और लोहा खनन ने आदिवासियों की जमीनें छीनी हैं, और उन्हें मुआवजा भी पर्याप्त नहीं मिला। भूरी कमीशन (1995) ने खनन से होने वाली आय में आदिवासियों को 50% हिस्सा देने की सिफारिश की थी, लेकिन यह लागू नहीं हुई।
विकास और उपेक्षा
गोंडवाना क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे की कमी स्पष्ट है। 2011 की जनगणना के अनुसार, इस क्षेत्र के कई जिलों में साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत (74%) से काफी कम है, खासकर आदिवासी बहुल क्षेत्रों में। स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच भी सीमित है, और कुपोषण यहां गंभीर समस्या है। सरकारी योजनाएं, जैसे आयुष्मान भारत, इन सुदूर इलाकों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाई हैं। इसके विपरीत, इस क्षेत्र के संसाधनों का उपयोग बड़े पैमाने पर औद्योगिक विकास के लिए हुआ, लेकिन स्थानीय समुदायों को इसका लाभ नहीं मिला।
सोशल मीडिया और आधुनिक आंदोलन
आज गोंडवाना राज्य की मांग सोशल मीडिया पर जोर पकड़ रही है। #GondwanaState और #TribalRights जैसे हैशटैग्स ट्विटर पर ट्रेंड कर रहे हैं, और यूजर्स सरकार से ठोस कदम उठाने की मांग कर रहे हैं। 9 अगस्त, विश्व आदिवासी दिवस, पर कई संगठनों ने ब्लॉक स्तर पर ज्ञापन सौंपने की योजना बनाई है। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और गोंडवाना महासभा जैसे संगठन इस आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं। हाल के पोस्ट्स में लोगों ने 2000 में छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड के गठन का हवाला देते हुए पूछा है कि अगर ये राज्य बन सकते हैं, तो गोंडवाना क्यों नहीं?
राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियां
गोंडवाना आंदोलन को राजनीतिक समर्थन की कमी का सामना करना पड़ रहा है। आदिवासी समुदाय की आर्थिक कमजोरी और मुख्यधारा की पार्टियों में शामिल होने वाले नेताओं ने इस मांग को कमजोर किया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने कभी गंभीरता से इस मुद्दे पर बात नहीं की। इसके अलावा, क्षेत्र के भीतर भाषाई और सांस्कृतिक विविधता भी एक चुनौती है, क्योंकि गोंड समुदाय के लोग विभिन्न स्थानीय भाषाओं (चट्टीसगढ़ी, मराठी, तेलुगु) को अपनाते गए हैं, जो एकरूपता की कमी पैदा करती है।
गोंडवाना के अधिकारों के लिए कई कदम जरूरी हैं। सरकार को वन अधिकार अधिनियम को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा और खनन से होने वाली आय में आदिवासियों को हिस्सा देना होगा। गोंडी भाषा को आधिकारिक मान्यता देकर इसकी मानकीकरण पर काम करना होगा। साथ ही, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को सुदूर क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए विशेष अभियान चलाने चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत पांचवीं और छठी अनुसूची के प्रावधानों को मजबूत करना भी जरूरी है, जो आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्वशासन की अनुमति देते हैं।
70 साल का इंतजार अब और लंबा नहीं होना चाहिए। गोंडवाना के लोग अपने प्राकृतिक और सांस्कृतिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, और यह समय है कि उनकी आवाज को सुना जाए। अगर छत्तीसगढ़ और झारखंड बन सकते हैं, तो गोंडवाना क्यों नहीं? यह सवाल आज हर आदिवासी के मन में गूंज रहा है, और इसका जवाब सरकार को देना होगा।


