चोला मंडलम फाइनेंस कंपनी का मामला: कर्ज न चुकाने पर सजा।
November 20, 2025
हरदा। हम बात करेंगे एक ऐसे मामले की जो हम सभी के लिए जरूरी है समझना—कर्ज की अदायगी और उसके निपटारे के कानूनी पहलू। इससे जुड़ा मामला ग्राम चारूवा के गोपाल राव से है, जिन पर कोर्ट ने सख्त कार्रवाई की है। क्यों और कैसे? आइए विस्तार से जानते हैं। गोपाल राव ने चोला मंडलम फाइनेंस कंपनी से एक वाहन, टाटा एस, का लोन लिया था। शुरुआत में कर्ज की किश्तें अदा होती रहीं, लेकिन फिर अचानक से भुगतान बंद हो गया। कंपनी ने कई बार लिखित और मौखिक नोटिस भेजे, लेकिन गोपाल राव ने कोई रुचि नहीं दिखाई। इसके बाद मामला मध्यस्थ न्यायालय तक पहुंचा, जहां कंपनी और गोपाल राव दोनों के बीच सुलहनामा पेश किया गया। हालांकि, गोपाल राव ने सुलह की शर्तों का पालन नहीं किया और नियत राशि जमा नहीं की। इसलिए मध्यस्थ न्यायालय ने कंपनी के पक्ष में अवॉर्ड पारित किया और गोपाल राव को बकाया राशि चुकाने का आदेश दिया। फिर भी, सूचनाओं और नोटिसों के बावजूद, गोपाल राव ने भुगतान नहीं किया। कंपनी ने जिला न्यायालय के समक्ष अवॉर्ड के निष्पादन के लिए आवेदन दिया और न्यायालय ने कंपनी के पक्ष में आदेश जारी किया। लेकिन गोपाल राव ने न तो भुगतान किया और न ही किसी प्रकार की ठोस प्रतिक्रिया दी। जब न्यायालय ने चल-अचल संपत्ति की कुर्की का आदेश दिया, तो कोई भी वस्तु जब्त नहीं हो सकी। यही नहीं, फिर भी न्यायालय ने गोपाल राव से कारण बताने को कहा कि आखिर क्यों उन्हें सिविल कारावास की सजा नहीं दी जानी चाहिए। जब उनका जवाब संतोषजनक नहीं मिला, तब कोर्ट ने 15 दिनों की सिविल कारावास की सजा सुनाई इस कार्यवाही के समय एरिया लीगल ऑफिसर राहुल बैरागी और ब्रांच मैनेजर हेमंत गुर्जर उपस्थित रहे। यह मामला हम सभी को यह याद दिलाता है कि कर्ज लेना आसान हो सकता है, लेकिन उसे समय पर चुकाना भी उतना ही अहम होता है। कानूनी प्रक्रियाएं कभी-कभी कठोर होती हैं, खासकर तब जब कोई जिम्मेदारी से बचता है। सिविल कारावास का आदेश एक सावधानी है कि बकाया राशि अदा करना अनिवार्य होता है। आखिरकार, यह कहानी सिर्फ एक मामला नहीं, बल्कि एक सीख है—हमारे वित्तीय वादे और जिम्मेदारियां जितनी गंभीर होती हैं, उनका पालन भी उतना ही जरूरी है। समय पर किश्तें चुकाकर न केवल हमारा नाम साफ रहता है, बल्कि हम अनावश्यक कानूनी परेशानियों से भी बच सकते हैं।

