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चैनपुरा नेपानगर में 33वां राष्ट्रीय आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन संपन्न दूसरे दिन ढाई से तीन लाख आदिवासी समाजजनों की ऐतिहासिक सहभागिता

प्रदेश संवाददाता: गेंदालाल माकोडे़

चैनपुरा (नेपानगर), बुरहानपुर।  राष्ट्रीय आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन का 33वां आयोजन इस वर्ष मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के नेपानगर विकासखंड अंतर्गत ग्राम चैनपुरा में 13, 14 एवं 15 जनवरी 2026 को भव्य रूप से आयोजित किया जा रहा है। सम्मेलन के दूसरे दिन आदिवासी समाज की ऐतिहासिक भागीदारी देखने को मिली, जिसमें ढाई से तीन लाख से अधिक समाजजनों ने सहभागिता की।

करीब 150 एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस विशाल आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों से आदिवासी समाज के लोग वाहनों के माध्यम से पहुंचे। भारी भीड़ को देखते हुए 7 से 8 स्थानों पर पार्किंग व्यवस्था की गई, जहां से लोगों को लगभग तीन किलोमीटर पैदल चलकर कार्यक्रम स्थल तक पहुंचना पड़ा।महासम्मेलन में बांसवाड़ा सांसद राजकुमार रोत, बुरहानपुर सांसद ज्ञानेश्वर पाटिल, विधायक अर्चना चिटनिस, मंजू दादू, पंधाना विधायक छाया मोरे, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार, आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया, हीरालाल अलावा, मोंटु सोलंकी, झुमा सोलंकी, सेना पटेल, कमलेश्वर डोडियार, थावरचंद मीणा, उमेश डामोर, छोटू वसावा, चेतर वसावा, पूर्व विधायक ग्यारसील रावत, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष अंतरसिंह आर्य, मध्यप्रदेश आदिवासी एकता परिषद के अध्यक्ष गजानन ब्राह्मणे, दादरा नगर हवेली से प्रभु टोकिया, पोरलाल खरते सहित अनेक जनप्रतिनिधि एवं सामाजिक नेता उपस्थित रहै,महाराष्ट्र से आए प्रसिद्ध आदिवासी साहित्यकार वहारू सोनवाने, जिन्होंने 150 से अधिक आदिवासी गीत एवं कविताएं लिखी हैं, ने भी सम्मेलन को संबोधित किया। इसके साथ ही जयस संगठन के राष्ट्रीय, प्रदेश, जिला एवं तहसील स्तर के पदाधिकारी बड़ी संख्या में मौजूद रहे। कार्यक्रम में दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, असम, छत्तीसगढ़, झारखंड सहित विभिन्न राज्यों से आए आदिवासी समाजजनों ने सहभागिता की। सम्मेलन में उपस्थित सांसदों, विधायकों एवं आयोग अध्यक्षों ने आदिवासी समाज के शैक्षणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक अधिकारों सहित उत्थान से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे।सम्मेलन की विशेष बात यह रही कि बैठक व्यवस्था आदिवासी परंपरा के अनुसार जाजम पद्धति में की गई, जिससे पारंपरिक एकता और समरसता का संदेश दिया गया। कार्यक्रम का संचालन बिलोरसिंह जमरे (अध्यक्ष, सम्मेलन आयोजन समिति) एवं उनकी टीम द्वारा किया गया। सम्मेलन का प्रमुख आकर्षण आदिवासी समाज की परंपरागत वेश-भूषा, हथियारों एवं सांस्कृतिक सामग्रियों की दुकानें रहीं, जहां खरीदारी के लिए दिनभर भारी भीड़ लगी रही। यह महासम्मेलन न केवल सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बना, बल्कि आदिवासी समाज की संगठनात्मक शक्ति और सामाजिक चेतना को भी मजबूती से प्रदर्शित करता नजर आया।

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